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"नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने को जेडीयू कार्यकर्ता और परिवार ने बताया साजिश, पार्टी में उठे सवाल"

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पटना: बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने का फैसला अब सियासी हलचल का केंद्र बन गया है। यह कदम न केवल जेडीयू के कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी पैदा कर रहा है, बल्कि उनके परिवार के सदस्यों ने भी इसे साजिश करार दिया है। मुख्यमंत्री के बहनोई अनिल कुमार ने मीडिया से बातचीत में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और सांसद संजय झा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह पूरा खेल पार्टी के अंदरूनी साजिशों का हिस्सा है।
अनिल कुमार ने कहा, “कार्यकर्ताओं का तो साफ कहना है कि ललन सिंह और संजय झा सब कुछ कर रहे हैं। टिकट बंटवारे के समय से ही यह सब शुरू हुआ। चिराग पासवान को इतनी सीट देने की क्या जरूरत थी? बिना साजिश के यह संभव नहीं हो सकता। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने केवल 110 दिन हुए, और वे राज्यसभा के उम्मीदवार कैसे बन गए, यह समझ से परे है। पार्टी में अब पूरी तरह से नियंत्रण कुछ नेताओं के हाथों में है। जब तक उनका बेटा निशांत सक्रिय रूप से नहीं आता, पार्टी सुरक्षित नहीं रहेगी।”
पटना में जेडीयू के नाराज कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का विरोध करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पोस्टर पर कालिख पोत दी। कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री का यह कदम पार्टी और राज्य के हित में नहीं है। उनका कहना है कि नीतीश कुमार को यह निर्णय वापस लेना चाहिए और राज्यसभा जाने से पहले पार्टी के अंदरूनी मतभेदों और विरोध को हल करना चाहिए।
वहीं विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। आरजेडी के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने कहा, “सच सामने आ गया है। नीतीश कुमार ने यह फैसला अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि भाजपा के दबाव में लिया है। चुनाव के दौरान भाजपा और जेडीयू ने जनता से वादा किया था कि ‘25 से 30, फिर से नीतीश’, लेकिन केवल तीन महीने के अंदर ही भाजपा ने उन्हें ‘फिनिश’ कर दिया।” उनके इस बयान से स्पष्ट है कि राज्यसभा जाने के फैसले को राजनीतिक विरोध और तनाव से जोड़ा जा रहा है।
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से बिहार की सियासत में नया मोड़ आने की संभावना है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी और परिवार के विरोध ने जेडीयू के अंदर असंतोष बढ़ा दिया है। विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले दिनों में इस फैसले के राजनीतिक और संगठनात्मक परिणाम बिहार की राजनीति में गहरी छाप छोड़ सकते हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगले कुछ दिनों में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बैठकों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की जाएगी। हालांकि जेडीयू की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पार्टी के भीतर इस विवाद ने सियासी गतिशीलता को और जटिल बना दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार की राजनीति में यह घटना आने वाले दिनों में कई नए मोड़ ला सकती है। जेडीयू के कार्यकर्ताओं की नाराजगी और परिवार के विरोध ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्यसभा जाने का फैसला केवल एक संवैधानिक कदम नहीं है, बल्कि पार्टी की आंतरिक शक्ति समीकरणों और भविष्य की रणनीति के लिए भी निर्णायक साबित होगा।

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